*** निशा - अनीशा ***
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| निशा - अनीशा |
कहीं धरती गगन -सी है, कहीं अंबर जमीं-सा है,
कहीं नदियाँ पड़ी प्यासी, कहीं सागर नदी-सा है,
कहीं घनघोर अनीशा तो कहीं पर भोर निशा है...
मेरे अंदर जो सब-कुछ है... वो बस सब-कुछ कमी-सा है !
✍️सुमीत सिवाल...

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