*** चाह ***
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| चाह |
हो गोपियों-सा प्रेम, मीरा-सा सुमिरन हो साँसों में,
हवा-सा बृज में यूँ डोलूँ, जैसे कि हिरण हो बागों में,
यही इक चाह है ! हो सुर्ख छवि हीना की, हाथों में...
हो श्याम-सा काजल, राधा-सी किरण हो आँखों में !
✍️सुमीत सिवाल...

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