ठौर...

🐦🐦🐦 ठौर 🐥🐥🐥

ठौर
ठौर 


सच कुछ और है, शोर कुछ और है...
आज कल ज़िन्दगी का दौर कुछ और है !


पल-पल बदल रही इंसान की शख्सियत यहाँ...
उछलते पासों की तौर कुछ और है !


ढूढ़ने चले हो तुम फरिश्तों को यकीन से...
धरती से आसमां का छोर कुछ और है !


रख रहा मैं एक-एक मोती को संभाल के...
बिखर रहे रिश्तों की डोर कुछ और है !


नफरतों की ये घटा उठ रही जो सामने...
इस ओर कुछ हो भले उस ओर कुछ और है !


कुछ पल की है प्रभा, देख लो तुम जागकर...
सुषुप्त इस रात्रि की भोर कुछ और है !


थक चुका है परिंदा अपनी इस उड़ान से... 
भटकते मुसाफिरों की ठौर कुछ और है ! 


✍️ सुमीत सिवाल...




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