🙏☺️ *** इल्तिजा *** ☺️🙏
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| इल्तिज़ा |
कभी धरती तो कभी आसमान मांगते हैं ,
तोहफे में वो हमसे दोनों जहान मांगते हैं।
मालूम है हमें हमारी औकात नहीं फिर भी ,
हसरतों में हम उनसे बस इक मुस्कान मांगते हैं।
एक अरमान था हमारा कि दुआओं में मांगें तुम्हें,
मेरे ख़ुदा भी अपने ख़ुदा से ये अज़ान मांगते हैं।
बहुत जी लिए शरीफों सी ज़िन्दगी अब तो,
माज़ी से वो अपना बचपन शैतान मांगते हैं।
गुलामी के वक़्त आज़ाद सोने की चिड़िया सा था ये,
ए सियासत ! तुझसे हम वही हिन्दुस्तान मांगते हैं।
अज़ब नज़ारा है यहां बाजार में आये लोग ,
ख़ुद ही अपनी मौत का सामान मांगते हैं।
देख कर दुनिया के बदलते हालात को 'सुमीत ' ...
रब से हम बस वही पुराना इंसान मांगते हैं।
✍️ सुमीत सिवाल...


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