*** मूरत *** मूरत कि इंसानों की तक़दीरें अगर भगवान लिखता है, क्यूँ मूरत बन के फिर घर-घर वही भगवान बिकता है, मैं कैसे मान लूँ रब बस इन्हीं पत्थरों में ज़िंदा है... मुझे फिर क्यूँ किसी इंसान में भगवान दिखता है। ✍️सुमीत सिवाल...
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