😌🚶♂️ढूंढता रहा 🧎♂️🐥
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| ढूंढ़ता रहा |
दुश्मनों में दोस्त, दोस्तों में यार ढूँढता रहा...
मैं अपनों में ही अपनों का प्यार ढूँढता रहा !
ख्वाहिशों का जो पुल टूटा मेरे अंदर...
मैं ज़िंदगी भर वो पहली दरार ढूँढता रहा !
कोई मिल जाए इस भीड़ में जो सुन सके मुझको...
ऐसे ही किसी शख्स का दीदार ढूँढता रहा !
किसी को समझने में तो किसी को समझाने में लगा रहा...
यूँ ही उम्रभर मैं ज़िन्दगी का सार ढूँढता रहा !
कोई बोला अभी इंसानियत ज़िंदा है दुनिया में...
मैं मारा-मारा बेचारा थका-हारा लाचार ढूँढता रहा !
ना किसी हथियार से जीता, हर दिल मैंने प्यार से जीता...
मगर हर बार मिली इस जीत में मैं हार ढूँढता रहा !
फरेबी लहरों में भटकी, गुमी, डूबी कश्ती को मैं...
कभी इस पार ढूँढता रहा, कभी उस पार ढूँढता रहा !
रिश्तों के हर इक बाजार में बिकता गया फिर भी...
हर इक अपना मेरे में बस वही व्यापार ढूँढता रहा !
सियासी खिचड़ियाँ जो पकी यहाँ सब में बंटी पर मैं...
पुरानी झोपडी में सूखी रोटी-आचार ढूँढता रहा !
✍️सुमीत सिवाल...


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