रूह

 *** रूह ***

Rooh Manisha
रूह

लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं

रूह भी होती है उस में ये कहाँ सोचते हैं !


रूह क्या होती है इस से उन्हें मतलब ही नहीं

वो तो बस तन के तक़ाज़ों का कहा मानते हैं !


रूह मर जाती है तो जिस्म है चलती हुई लाश

इस हक़ीक़त को समझते हैं न पहचानते हैं !


कितनी सदियों से ये वहशत का चलन जारी है

कितनी सदियों से है क़ाएम ये गुनाहों का रिवाज !


लोग औरत की हर इक चीख़ को नग़्मा समझे

वो क़बीलों का ज़माना हो कि शहरों का रिवाज !


जब्र से नस्ल बढ़े ज़ुल्म से तन मेल करें

ये अमल हम में है बे-इल्म परिंदों में नहीं !


हम जो इंसानों की तहज़ीब लिए फिरते हैं

हम सा वहशी कोई जंगल के दरिंदों में नहीं !


इक बुझी रूह लुटे जिस्म के ढाँचे में लिए

सोचती हूँ मैं कहाँ जा के मुक़द्दर फोड़ूँ !


मैं न ज़िंदा हूँ कि मरने का सहारा ढूँडूँ

और न मुर्दा हूँ कि जीने के ग़मों से छूटूँ !


कौन बतलाएगा मुझ को किसे जा कर पूछूँ

ज़िंदगी क़हर के साँचों में ढलेगी कब तक !


कब तलक आँख न खोलेगा ज़माने का ज़मीर

ज़ुल्म और जब्र की ये रीत चलेगी कब तक !


🪔🕯️ मनीषा 🕯️🪔


🙏😔


No comments:

Post a Comment

Please don't enter any spam link in comment box ! 🙏

Popular Posts

About me

My photo
Like Simplicity ☺️ Love Babies. Isht dev - Radhe Krishna

Sumeet Kavyatra

@Sumeet Siwal